रामपुर तिराहा कांडः सीबीआई कोर्ट ने सुनाई तीन पुलिसकर्मियों को सजा

30 साल बाद फर्जी हथियार बरामदगी मामले में आया फैसला, तत्कालीन थाना प्रभारी समेत तीन पुलिसकर्मी दोषी, डेढ़-डेढ़ साल की सजा

मुजफ्फरनगर। रामपुर तिराहा कांड से जुड़े फर्जी हथियार बरामदगी मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत ने मंगलवार को तीन दशक से अधिक समय बाद बड़ा फैसला सुनाते हुए तत्कालीन झिंझाना थाना प्रभारी ब्रज किशोर तथा सिपाही अनिल कुमार और उमेश चंद को दोषी करार दिया। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम एवं विशेष सीबीआई न्यायालय के न्यायाधीश डॉ. डी.एस. फौजदार ने तीनों आरोपियों को विभिन्न धाराओं में दोषसिद्ध पाते हुए डेढ़-डेढ़ वर्ष के साधारण कारावास एवं अर्थदंड की सजा सुनाई। सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी।

यह मामला एक अक्तूबर 1994 के रामपुर तिराहा कांड के दौरान आंदोलनकारियों से कथित रूप से हथियार बरामद दिखाने से जुड़ा था। तत्कालीन झिंझाना थाना प्रभारी ब्रज किशोर ने सिपाही अनिल कुमार, उमेश कुमार और कमल किशोर के साथ बसों की जांच के दौरान आंदोलनकारियों से तमंचे और खुखरी बरामद होने का दावा करते हुए छपार थाने में मुकदमा दर्ज कराया था। बाद में मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। जांच के दौरान कथित बरामद तमंचों और कारतूसों को विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजा गया। फोरेंसिक जांच में खुलासा हुआ कि जिन कारतूसों को तमंचों के साथ भेजा गया था, वे उन हथियारों से चलाए ही नहीं गए थे। इस आधार पर सीबीआई ने तत्कालीन थाना प्रभारी ब्रज किशोर, सिपाही अनिल कुमार, उमेश कुमार और कमल किशोर के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र और फर्जी साक्ष्य तैयार करने सहित विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया। सुनवाई के दौरान आरोपी कमल किशोर का निधन हो गया, जबकि शेष तीन आरोपियों के विरुद्ध मुकदमा चलता रहा।

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करीब 30 वर्षों तक चली सुनवाई, सैकड़ों तारीखों और लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद मंगलवार को तीनों आरोपी विशेष सीबीआई अदालत में उपस्थित हुए। अदालत ने पहले उन्हें दोषी ठहराया और दोपहर बाद सजा के प्रश्न पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दंडादेश सुनाया। सजा पर बहस के दौरान सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक धारा सिंह मीणा ने अदालत से कहा कि आरोपियों ने आपराधिक षड्यंत्र रचकर अपने पद का दुरुपयोग किया और निर्दाेष लोगों को झूठे मुकदमे में फंसाने के लिए फर्जी साक्ष्य तैयार किए, इसलिए उन्हें कठोरतम दंड दिया जाना चाहिए। वहीं बचाव पक्ष के अधिवक्ता सुरेंद्र कुमार शर्मा ने दलील दी कि आरोपी पिछले लगभग 30 वर्षों से मुकदमे का सामना कर रहे हैं, अब वरिष्ठ नागरिक हैं, कई बीमारियों से ग्रस्त हैं, उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और यह उनका पहला अपराध है, इसलिए उदार दृदृष्टिकोण अपनाया जाए।

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अपने 60 पृष्ठों के निर्णय में अदालत ने कहा कि जब राज्य के कर्मचारी, विशेषकर पुलिस अधिकारी, स्वयं निर्दाेष नागरिकों को फंसाने के लिए आपराधिक षड्यंत्र रचते हैं और फर्जी साक्ष्य गढ़ते हैं, तो यह केवल किसी व्यक्ति के विरुद्ध अपराध नहीं बल्कि संपूर्ण राज्य व्यवस्था और न्याय प्रणाली के विरुद्ध अपराध है। न्यायालय ने यह भी माना कि राज्य और उसके कर्मचारियों का प्रथम दायित्व नागरिकों का विधिक संरक्षण करना है, हालांकि दोषियों की अधिक आयु को भी दंड निर्धारण में ध्यान में रखा गया।

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अदालत ने तीनों दोषियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी, 182, 211 और 218 तथा आयुध अधिनियम की धारा 25 के तहत दोषी ठहराया। धारा 120-बी, 218 और आयुध अधिनियम की धारा 25 में प्रत्येक को डेढ़-डेढ़ वर्ष का साधारण कारावास और पांच-पांच हजार रुपये का अर्थदंड, धारा 211 में एक वर्ष का साधारण कारावास एवं पांच हजार रुपये अर्थदंड तथा धारा 182 में तीन माह का साधारण कारावास और एक हजार रुपये अर्थदंड सुनाया गया। अर्थदंड जमा न करने पर अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा। अदालत ने आदेश दिया कि सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी।

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